कहाँ किरदार में अब वो पुराना ज़ोर-ओ-दम निकले
जहाँ भी देखिए हर बात का मतलब रक़म निकले
ग़रीबी आदमी को किस क़दर मजबूर करती है
ज़ुबाँ ख़ामोश रहती है मगर आँखों से ग़म निकले
न कोई पूछता था हाल जब ख़ाली थी जेब अपनी
ज़रा पैसे हुए तो हर तरफ़ से मुहतशम निकले
समझ बैठे थे जिनको दोस्त अपने ख़ून के रिश्ते
ज़रूरत पर वही पीछे हटाते याँ क़दम निकले
अना ग़ैरत वफ़ा जज़्बात सब नीलाम होते हैं
जो सिक्के खन-खनाए तो कई चेहरे सनम निकले
ये दुनिया मानती है बस उसी को साहिब-ए-क़ुदरत
कि जिसकी जेब से हरदम यहाँ मोटी रक़म निकले
मुझे इस दौर की 'रेहान' हर ठोकर ने समझाया
यहाँ इंसान कम निकले मगर ज़्यादा भरम निकले















