दिल की महफ़िल बड़ी हसरत से सजा दी हम ने
फिर तेरे नाम पे हर चीज़ गँवा दी हमने
फ़ासले तय न हुए हम से तुम्हारी ज़िद के
दरमियाँ खींच के दीवार गिरा दी हम ने
लोग कहते रहे घाटे का जुआ है उल्फ़त
जानते बूझते भी बाज़ी लगा दी हम ने
उम्र भर ज़ख़्म को जीने की दुआ देते रहे
दर्द को अपनी ही धड़कन की सदा दी हम ने
ख़ुद को खो कर तुझे पाने की सज़ा में अक्सर
तेरी नफ़रत को भी उल्फ़त की जज़ा दी हमने
ख़ाक होना था मुहब्बत में मुक़द्दर अपना
अपनी ही राख को पुर-ज़ोर हवा दी हम ने
लोग रोते रहे खो कर याँ ज़माने की ख़ुशी
तेरी हसरत में ये दुनिया ही गँवा दी हम ने
तेरी ख़ुशियों के उजाले की तलब थी 'रेहान'
अपने कमरे में हर इक शाम बिता दी हम ने















