ख़ला की ओढ़ कर चादर अदम का गीत गाता हूँसुना कर अपनी ख़ामोशी मैं ख़ुद में डूब जाता हूँमुझे ज़िंदान-ए-हस्ती में भला क्यूँ क़ैद रक्खा हैमैं वो पंछी हूँ जो उड़ने से पहले टूट जाता हूँवहाँ पर मौत भी हैरान होकर रुक गई शायदजहाँ मैं ज़िंदगी का आख़िरी मंज़र सजाता हूँ— REHAN KHAN