दर्द दुनिया को मिरा हँस के बताते क्यों हैं
वो परेशाँ हैं तो फिर मुझ को सताते क्यों हैं
काम पड़ता था तो सीने से लगा लेते थे
अब मिरे नाम से वो आँख चुराते क्यों हैं
जिन को चलना था मिरे पाँव के छालों पे कभी
अब वही लोग मिरे ज़ख़्म गिनाते क्यों हैं
वक़्त बदला तो कई यार बदलते देखे
सब पुराने मिरे एहसान भुलाते क्यों हैं
सामने बनते हैं हमदर्द मिरे ग़म के सभी
पीठ पीछे वही औक़ात दिखाते क्यों हैं
जिन के किरदार पे पर्दे थे मिरी चुप के कभी
वक़्त-ए-ग़ुर्बत में मिरी ख़ाक उड़ाते क्यों हैं
मैंने जिस जिस को भी चाहा था भरोसे की तरह
वो मिरे साए से अब ख़ौफ़-सा खाते क्यों हैं
मैंने सीखा न था लोगों को बदलना वरना
आज जितने हैं मिरे साथ ये आते क्यों हैं
हम अगर कुछ भी नहीं उन के मुताबिक़ 'रेहान'
वो हमें सामने फिर सर पे बिठाते क्यों हैं















