फ़रेबी इश्क़ की बंदिश से अब आज़ाद रहने दो

बहुत रोया है ये दिल अब इसे दिलशाद रहने दो

क़सम देकर बुलाओ मत मुझे तुम शहर में अपने
कि दिल्ली दूर है जानाँ फ़रीदाबाद रहने दो

ग़मों की धूप ने झुलसा दिया है शहर-ए-दिल्ली को
सुकूँ है गाँव में मेरे यहीं आबाद रहने दो

तुम्हारी सोच है हम हो गए हैं दर्द से पत्थर
तुम्हारी सोच के सदक़े हमें बर्बाद रहने दो

नया कोई फ़साना अब हमें भाता नहीं जानाँ
जो गुज़री दिल पे बस वो इक पुरानी याद रहने दो

बड़ी रौनक़ है दुनिया में मगर ये खाए जाती है
अकेलेपन के इस कोने में दिल नाशाद रहने दो

दिखावे की हवेली से मिरा क्या वास्ता जानाँ
मिरे टूटे हुए घर की यही बुनियाद रहने दो

समझदारी की बातें तुम ज़माने को सिखाओ अब
हमारी धुन में हम को तुम यूँ ही उस्ताद रहने दो

— REHAN KHAN

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