किसी की आँख से उतरा हुआ हूँ
किसी की आँख का तारा हुआ हूँ
हुआ हूँ हाथ से मैं सब के ज़ख़्मी
सभी के हाथ दुत्कारा हुआ हूँ
मिरी हालत न पूछो तो है बेहतर
हर इक उम्मीद से हारा हुआ हूँ
बहुत हालात ने कुचला है मुझ को
मैं तब जाकर यूँ बेचारा हुआ हूँ
मैं अपनी बेवक़ूफ़ी से ही अक्सर
मिरी तकलीफ़ का चारा हुआ हूँ
यहाँ इंसान मरते हैं छुरी से
मैं ज़ेहनी तौर से मारा हुआ हूँ
— REHAN KHAN















