'शादी मुबारक'
मुक़द्दर हो तिरा रौशन घटा सावन की छाई हो
कि ख़ुशियाँ हर तरफ़ बरसें तिरी बारात आई हो
तुझे मुझ से मुझे तुझ से ये आज़ादी मुबारक हो
सुन ऐ महलों की शहज़ादी तुझे शादी मुबारक हो
फ़लक का वो क़मर तेरे ही दामन ने समेटा हो
कि इक रश्क-ए-क़मर जैसा तिरे घर में भी बेटा हो
दुआ है तू रहे उसके बिना और वो न तेरे बिन
फले-फूले तिरे इस घर में भी ख़ुशियाँ ये रातों-दिन
तुझे दुनिया की हर इक चीज़ आसानी से मिल जाए
उदासी में तिरा चेहरा ब-मिस्ल-ए-फूल खिल जाए
मगर फिर ज़िंदगी तुझ को घड़ी वो भी दिखाएगी
किया जो तू ने मेरे साथ तुझ पे आज़माएगी
उदासी बेकसी बेचैनियाँ तुझ को भी फिर घेरें
तिरी भी नींद उड़ जाए कि ख़ुशियाँ तुझ से मुँह फेरें
तिरी हालत मिरी हालत से भी बदतर नुमायाँ हो
रहे नाशाद तू हर दम तू मेरी मिस्ल-ए-गिर्यां हो
क़फ़स से तेरे भी हर इक ख़ुशी आज़ाद हो जाए
मुझे बर्बाद करने वाली तू बर्बाद हो जाए















