दिल ये मेरा ख़ाक हुआ है
आँखों में हर ख़्वाब फ़ना है
रूह भी अब तो चीख़ उठी है
ज़ख़्म में ऐसा दर्द उठा है
मिट कर भी तो ज़िंदा हूँ मैं
इश्क़ भी गोया एक सज़ा है
ख़ामोशी की ये आवाज़ें
दर्द की ये भी एक अदा है
जल कर भी दिल हँसता जाए
कैसा जुनूँ है कैसी वफ़ा है
मुश्किल रस्ते होने लगे अब
शायद ये मंज़िल का पता है
आख़िर में क्या पाया तू ने
जीत में भी तो दर्द छुपा है
— REHAN KHAN















