नसीब अपनी तमन्ना का आज़मा के चले
गए थे भीड़ में तन्हाई हम चुरा के चले
तुम्हारी बज़्म में सब का हुजूम था लेकिन
हमीं थे ऐसे जो ख़ुद को यहाँ गँवा के चले
वो एक रात की मेहमान थी जो बीत गई
दिए बुझा के मिले थे दिए बुझा के चले
जो दिल की बात थी होंठों पे आ नहीं पाई
नज़र मिली थी मगर हम नज़र झुका के चले
पलट के देखा नहीं उस ने एक बार हमें
हम अपनी उम्र की सब बंदिशें भुला के चले
वफ़ा की राह में बस ख़ार थे मुक़द्दर में
सो अपने पाँव के छाले भी हम सजा के चले
यहाँ किसी को किसी का ख़याल क्या होगा
कि लोग लाश से भी रास्ता बचा के चले
कहाँ तलाश करोगे कलाम शायर का
मुशायरे से जो अपनी ग़ज़ल सुना के चले
गिला नहीं है कोई अब ज़माने से 'रेहान'
तमाम ज़ख़्म भी सीने में हम छुपा के चले















