ख़्वाब आँखों के ख़ज़ाने में नहीं आएँगे
अश्क इतने हैं बहाने में नहीं आएँगे
हम ने हँस कर ही गुज़ारी है हमेशा ये हयात
हम कभी रोने-रुलाने में नहीं आएँगे
हो गया बैठना-उठना जो रईसों में अब
अब ग़रीबों के वो ख़ाने में नहीं आएँगे
दर्द वो है जो लहू बन के रगों में दौड़े
दर्द ये लिखने-लिखाने में नहीं आएँगे
पढ़ सके गर तो मिरे दर्द मिरी आँख में पढ़
क़िस्से ये सारे सुनाने में नहीं आएँगे
आख़िरी वक़्त भी रखते हैं अना पास में हम
पाँव अब उन के दबाने में नहीं आएँगे
तेरी दुनिया से जो जाएँगे तो वापस 'रेहान'
फिर किसी और ज़माने में नहीं आएँगे
— REHAN KHAN















