ग़ुर्बत के इस आलम में ताज-ओ-शाही पे लिखता हूँ
नाबीना हो कर भी मैं तो बीनाई पे लिखता हूँ
मेरे मुख़ालिफ़ हो जाते हैं इस ख़ातिर दुनिया वाले
झूठ पे कुछ लिखता ही नहीं मैं सच्चाई पे लिखता हूँ
महफ़िल वाले लोग वो होंगे जो भी चमन पर लिखते हैं
मैं सहरा का रहने वाला तन्हाई पे लिखता हूँ
ख़ामी पर उस की क्या लिखना रूप ख़ुदा ने ऐसा दिया
जब लिखता हूँ मैं बस उस की रानाई पे लिखता हूँ
ज़ेर-ए-साया जब लिखता हूँ माँ के आँचल के 'रेहान'
ख़ाक-नशीं हो कर के फ़लक की ऊँचाई पे लिखता हूँ
— REHAN KHAN















