'मिट्टी के ढेर'

ज़मीं मिट्टी फ़लक मिट्टी मकाँ मिट्टी मकीं मिट्टी
सिकंदर ढूँढने निकला था क्या मिट्टी के ढेरों में

हसीं चेहरे जो कल तक थे वो ज़ेर-ए-ख़ाक सोए हैं
कहाँ का हुस्न कैसा इश्क़ अब मिट्टी के ढेरों में

जो उड़ते थे हवाओं में जिन्हें था नाज़ ख़ुद पर ही
क़लंदर बन के बैठे हैं यहाँ मिट्टी के ढेरों में

जिन्हें हम ज़िंदगी कहते जिन्हें हम जाँ समझते थे
लहद में छोड़ कर आए उन्हें मिट्टी के ढेरों में

न समझो ख़त्म मंज़िल को ये बस इक मोड़ है नादाँ
नया इक रूप पाएँगे इन्हीं मिट्टी के ढेरों में

नज़र जो आ रही है बस वही दुनिया नहीं होती
निहाँ हैं नूर के दरिया इन्हीं मिट्टी के ढेरों में

ज़रा सा देख कर चलना यहाँ इस ख़ाक के ऊपर
शहंशाह-ए-ज़माँ सोए इन्हीं मिट्टी के ढेरों में

— REHAN KHAN

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