उजाले को निराला बोलते हैं
हज़ारों का हिबाला खोलते हैं
नशें ने हाथ जोड़े है उन्हें तो
उन्हीं नज़रों को प्याला बोलते हैं
कईं शाइ'र बनाएँ हैं उन्होंने
उन्हें तो सब क़िताला बोलते हैं
हवा भी दूर है अब उस गली से
गली को भी रिज़ाला बोलते हैं
— Vishakt ki Kalam se















