हमें बेरोज़गारी खा रही है
घुटन ये रोज़ बढ़ती जा रही है
परेशानी हमारी अब न पूछो
समाधानों की अर्थी जा रही है
किसी को नौकरी मिलती नहीं है
है जिन के पास उन की जा रही है
किसी की आस है सब ठीक होगा
किसी की साँस रुकती जा रही है
मदद की दूर तक आशा नहीं है
निराशा और बढ़ती जा रही है
पढ़े थे और कुछ पर काम कुछ है
पढ़ाई काम किस के आ रही है
बिकाऊ हो गई है अब जवानी
बुढ़ापे की तरफ़ को जा रही है
— Vishakt ki Kalam se















