mire kirdaar ko akshar vahii aabaad karta hai | मिरे किरदार को अक्सर वही आबाद करता है

  - Vivek Vistar

मिरे किरदार को अक्सर वही आबाद करता है
मगर शिकवा स्वयं को वो स्वयं बर्बाद करता है

कभी अल्फाज़ में बँधकर ग़ज़ल मैं हो अगर जाऊँ
ज़माने में वही इक जो मुझे इरशाद करता है

वो बहकर जब निकलती है हिमालय–आशियाने से
उसी गंगा का होना मन–इलाहाबाद करता है

यहाँ सारे मुसाफ़िर मंज़िलों को याद करते हैं
मगर मैं वो मुसाफ़िर हूँ जो राहें याद करता है

  - Vivek Vistar

Musafir Shayari

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