मिरे किरदार को अक्सर वही आबाद करता है
मगर शिकवा स्वयं को वो स्वयं बर्बाद करता है
कभी अल्फाज़ में बँधकर ग़ज़ल मैं हो अगर जाऊँ
ज़माने में वही इक जो मुझे इरशाद करता है
वो बहकर जब निकलती है हिमालय–आशियाने से
उसी गंगा का होना मन–इलाहाबाद करता है
यहाँ सारे मुसाफ़िर मंज़िलों को याद करते हैं
मगर मैं वो मुसाफ़िर हूँ जो राहें याद करता है
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