जागना चाहता हूँ जगाओ मुझे

ज़िंदगी की हक़ीक़त बताओ मुझे

भूलना चाहता हूँ मैं इक शख़्स को
नाम से उस के तुम मत बुलाओ मुझे

इक न इक दिन मुक़द्दर बदल जाएगा
मुफ़लिसी इतना तो मत सताओ मुझे

बात आई है कह दो ग़लत कुछ नहीं
यार ग़लती तो मेरी बताओ मुझे

इन भरी आँख कब तक पुकारूँ तुझे
मौत आ कर गले से लगाओ मुझे

रात भर देखने दो हसीं ख़्वाब तुम
दिन निकलते भले तुम जलाओ मुझे

— Shubham Rai 'shubh'

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