लौट के फिर से ज़िन्दगी आई
जबसे हम को सुख़नवरी आई
हम किवाड़ेॆ दरीचेॆ बंद करे
और दरारों से रौशनी आई
बेच डाले थे ख़्वाब सारे तब
दाम में एक नौकरी आई
काँच के टुकड़े बे-हिसाब हुए
यूँही हम
में न बे-दिली आई
भूल जाते है सब वो पहला घर
जिन से साँसें व ज़िन्दगी आई
हर मुरादों पे उस ने देरी की
फिर भी हम में न काफ़िरी आई
— Aadil Sulaiman















