मेरी जीने की ख़्वाहिश मर रही थी
वो जब बैगों में कपड़े भर रही थी
अगर इतना बुरा था इतने बरसों
वो मेरे साथ में क्या कर रही थी
दवा देती थी पर मैं जानता था
वो मेरे साथ में क्या कर रही थी
मेरे ही सामने मेरी हक़ीक़त
मेरे ख़्वाबों का सौदा कर रही थी
उसे करता था मैं पर्दे की तनक़ीद
वो अब मुझ से भी पर्दा कर रही थी
बड़ी मेहनत से जो कश्ती बनाई
वो अब मुझ से किनारा कर रही थी
चलो माना दिए ने ख़ुद-कुशी की
हवा ताक में क्या कर रही थी
सड़क के मोड़ पर नन्ही सी गुड़िया
गिरा खाना इकट्ठा कर रही थी
— Adv Aaves Shaikh















