हम कहीं थे तुम कहीं थे
ख़्वाब आँखों में नहीं थे
हौसले से दुनिया जीती
साथ अपने भी नहीं थे
झूट कितना बोलते हैं
कह रहे हैं हम यहीं थे
जीत ही हम को मिली हैं
हार के पीछे नहीं थे
— Prashant Kumar
ख़्वाब आँखों में नहीं थे
हौसले से दुनिया जीती
साथ अपने भी नहीं थे
झूट कितना बोलते हैं
कह रहे हैं हम यहीं थे
जीत ही हम को मिली हैं
हार के पीछे नहीं थे
Other ghazal from the same pen
Voices in the same orbit
Poetry by feeling