dhoondte kya ho in aankhoñ men kahaanii meri | ढूँडते क्या हो इन आँखों में कहानी मेरी

  - Aitbar Sajid

ढूँडते क्या हो इन आँखों में कहानी मेरी
ख़ुद में गुम रहना तो आदत है पुरानी मेरी

भीड़ में भी तुम्हें मिल जाऊँगा आसानी से
खोया खोया हुआ रहना है निशानी मेरी

मैं ने इक बार कहा था कि बहुत प्यासा हूँ
तब से मशहूर हुई तिश्ना-दहानी मेरी

यही दीवार-ओ-दर-ओ-बाम थे मेरे हमराज़
इन्ही गलियों में भटकती थी जवानी मेरी

तू भी इस शहर का बासी है तो दिल से लग जा
तुझ से वाबस्ता है इक याद पुरानी मेरी

कर्बला दश्त-ए-मोहब्बत को बना रक्खा है
क्या ग़ज़ल-गोई है क्या मर्सिया-ख़्वानी मेरी

धी
में लहजे का सुख़नवर हूँ न सहबा हूँ न जोश
मैं कहाँ और कहाँ शो'ला-बयानी मेरी

  - Aitbar Sajid

Yaad Shayari

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