तुझ सेे बिछड़े जो हम अगर बिखर जाएँगे
तेरे दिल से निकले हुए किधर जाएँगे
निकले है ख़ुद को तुझ
में ढूँडने घर से हम
है किस को अंदाज़ा हम कब घर जाएँगे
सालिम लगता है अब हमें तिरे बाहों में
तेरे पहलू से निकले तो डर जाएँगे
उम्मीद-ए-फ़स्ल-ए-गुल है अब हम को तुम सेे
आख़िर ये दिन ही तो हैं दिन सँवर जाएँगे
तेरे दर पे आने की देरी हैं बस फिर
हैं ख़ुद-कुश हम तेरे दर पे मर जाएँगे
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