hamne maana ik na ik din laut ke tu aa jaayega | हमने माना इक न इक दिन लौट के तू आ जाएगा

  - Akhtar Saeed Khan

हमने माना इक न इक दिन लौट के तू आ जाएगा
लेकिन तुझ बिन उम्र जो गुज़री कौन उसे लौटाएगा

  - Akhtar Saeed Khan

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    दीदनी है ज़ख़्म-ए-दिल और आप से पर्दा भी क्या
    इक ज़रा नज़दीक आ कर देखिए ऐसा भी क्या

    हम भी ना-वाक़िफ़ नहीं आदाब-ए-महफ़िल से मगर
    चीख़ उठें ख़ामोशियाँ तक ऐसा सन्नाटा भी क्या

    ख़ुद हमीं जब दस्त-ए-क़ातिल को दुआ देते रहे
    फिर कोई अपनी सितमगारी पे शरमाता भी क्या

    जितने आईने थे सब टूटे हुए थे सामने
    शीशागर बातों से अपनी हम को बहलाता भी क्या

    हम ने सारी ज़िंदगी इक आरज़ू में काट दी
    फ़र्ज़ कीजे कुछ नहीं खोया मगर पाया भी क्या

    बे-महाबा तुझ से अक्सर सामना होता रहा
    ज़िंदगी तू ने मुझे देखा न हो ऐसा भी क्या

    बे-तलब इक जुस्तुजू सी बे-सबब इक इंतिज़ार
    उम्र-ए-बे-पायाँ का इतना मुख़्तसर क़िस्सा भी क्या

    ग़ैर से भी जब मिला 'अख़्तर' तो हँस कर ही मिला
    आदमी अच्छा हो लेकिन इस क़दर अच्छा भी क्या
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    Akhtar Saeed Khan
    सैर-गाह-ए-दुनिया का हासिल-ए-तमाशा क्या
    रंग-ओ-निकहत-ए-गुल पर अपना था इजारा क्या

    खेल है मोहब्बत में जान ओ दिल का सौदा क्या
    देखिए दिखाती है अब ये ज़िंदगी क्या क्या

    जब भी जी उमड आया रो लिए घड़ी भर को
    आँसुओं की बारिश से मौसमों का रिश्ता क्या

    कब सर-ए-नज़ारा था हम को बज़्म-ए-आलम का
    यूँ भी देख कर तुम को और देखना था क्या

    दर्द बे-दवा अपना बख़्त ना-रसा अपना
    ऐ निगाह-ए-बे-परवा तुझ से हम को शिकवा क्या

    बे-सवाल आँखों से मुँह छुपा रहे हो क्यूँ
    मेरी चश्म-ए-हैराँ में है कोई तक़ाज़ा क्या

    हाल है न माज़ी है वक़्त का तसलसुल है
    रात का अंधेरा क्या सुब्ह का उजाला क्या

    जो है जी में कह दीजे उन के रू-ब-रू 'अख़्तर'
    अर्ज़-ए-हाल की ख़ातिर ढूँडिए बहाना क्या
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    Akhtar Saeed Khan
    कैसे समझाऊँ नसीम-ए-सुब्ह तुझ को क्या हूँ मैं
    फूल के साए में मुरझाया हुआ पत्ता हूँ मैं

    ख़ाक का ज़र्रा भी कोई तेरे दामन में न था
    क़द्र कर ऐ ज़िंदगी टूटा हुआ तारा हूँ मैं

    हर धड़कते दिल से अन-जाना सा रिश्ता है मिरा
    आग दामन में किसी के भी लगे जलता हूँ मैं

    अपनी तारीकी समेटे पूछती है मुझ से रात
    कौन सी है सुब्ह जिस को ढूँढने निकला हूँ मैं

    मुझ को समझाए तो कोई राज़दार-ए-काएनात
    मुझ में है आबाद ये दुनिया कि ख़ुद अपना हूँ मैं

    ज़िंदगी टूटे हुए ख़्वाबों में गुज़री है तो क्या!
    आज भी इक ख़्वाब आँखों में लिए बैठा हूँ मैं

    सम्त-ए-मंज़िल ही बदल जाए तो मेरा क्या क़ुसूर
    रास्तों से पूछ कर देखो कहीं ठहरा हूँ मैं

    देर तक हसरत से देखेगी उसे शाम-ए-सफ़र
    जिस ज़मीं पर नक़्श अपने छोड़ कर गुज़रा हूँ मैं

    चुपके चुपके रात भर कहता है 'अख़्तर' मुझ से दिल
    बस्तियाँ आबाद हैं मुझ से मगर सहरा हूँ मैं
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    Akhtar Saeed Khan
    नैरंगी-ए-नशात-ए-तमन्ना अजीब है
    कुछ शाम से क़फ़स में उजाला अजीब है

    शरमा रहे हैं तार-ए-गरेबान-ओ-चाक-ए-दिल
    कुछ दिन से रंग-ए-लाला-ए-सहरा अजीब है

    हर ख़्वाब-ए-ए'तिबार शिकस्तों से चूर है
    दिल में मगर ग़ुरूर-ए-तमन्ना अजीब है

    सारा बदन है धूप में झुलसा हुआ मगर
    दिल पर जो पड़ रहा है वो साया अजीब है

    फेंके नहीं हैं आज तलक रेज़ा-हा-ए-दिल
    टूटे तअ'ल्लुक़ात का रिश्ता अजीब है

    जब तक नज़र न कीजिए यक क़तरा ख़ूँ है दिल
    लेकिन जो देखिए तो ये दुनिया अजीब है

    'अख़्तर' ये तेरे पाँव के काँटे नए नहीं
    काँटों से खेलता हुआ छाला अजीब है
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    Akhtar Saeed Khan
    इक किरन मेहर की ज़ुल्मात पे भारी होगी
    रात उन की है मगर सुब्ह हमारी होगी

    हम-सफ़ीरान-ए-चमन मिल के पुकारें तो ज़रा
    यहीं ख़्वाबीदा कहीं बाद-ए-बहारी होगी

    इस तरफ़ भी कोई ख़ुश्बू से महकता झोंका
    ऐ सबा तू ने तो वो ज़ुल्फ़ सँवारी होगी

    ये जो मिलती है तिरे ग़म से ग़म-ए-दहर की शक्ल
    दिल ने तस्वीर से तस्वीर उतारी होगी

    बू-ए-गुल आती है मिट्टी से चमन की जब तक
    हम पे दहशत न ख़िज़ाँ की कभी तारी होगी
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    Akhtar Saeed Khan

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