सुब्ह हर उजाले पे रात का गुमाँ क्यूँँ है
जल रही है क्या धरती अर्श पे धुआँ क्यूँँ है
ख़ंजरों की साज़िश पर कब तलक ये ख़ामोशी
रूह क्यूँँ है यख़-बस्ता नग़्मा बे-ज़बाँ क्यूँँ है
रास्ता नहीं चलते सिर्फ़ ख़ाक उड़ाते हैं
कारवाँ से भी आगे गर्द-ए-कारवाँ क्यूँँ है
कुछ कमी नहीं लेकिन कोई कुछ तो बतलाओ
'इश्क़ इस सितमगर का शौक़ का ज़ियाँ क्यूँँ है
हम तो घर से निकले थे जीतने को दिल सब का
तेग़ हाथ में क्यूँँ है दोश पर कमाँ क्यूँँ है
ये है बज़्म-ए-मय-नोशी इस में सब बराबर हैं
फिर हिसाब-ए-साक़ी में सूद क्यूँँ ज़ियाँ क्यूँँ है
देन किस निगह की है किन लबों की बरकत है
तुम में 'जाफ़री' इतनी शोख़ी-ए-बयाँ क्यूँँ है
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