khushi ka lamha ret tha so haath se nikal gaya | ख़ुशी का लम्हा रेत था सो हाथ से निकल गया

  - Ambreen Haseeb Ambar

ख़ुशी का लम्हा रेत था सो हाथ से निकल गया
वो चौदहवीं का चाँद था अँधेरी शब में ढल गया

है वस्फ़ उस के पास ये बदल सके हर एक शय
सो मुझ को भी बदल दिया और आप भी बदल गया

मचल रहा था दिल बहुत सो दिल की बात मान ली
समझ रहा है ना-समझ की दाव उस का चल गया

ये दौड़ भी अजीब सी है फ़ैसला अजीब-तर
की फ़ातेह-ए-हयात वो जो गिर के फिर सँभल गया

समझ लिया अहम नहीं मैं उस के वास्ते मगर
नज़र फिर उस से मिल गई ये दिल की फिर बहल गया

अजीब मेरा अक्स था उतर के उस की आँख में
सँवारा मुझ को इस तरह की आइना ही जल गया

  - Ambreen Haseeb Ambar

Tasweer Shayari

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