मैं नीम को ही चाशनी कहता रहाफिर दोस्ती को ज़िंदगी कहता रहाहर बात से था बे-ख़बर मासूम दिलक्यूँ ज़िंदगी को ख़ुद-कुशी कहता रहासंसार से मुझ को मिली जो आजतकहर बद-दुआ को बंदगी कहता रहासाज़िश में दिल लगता था उस का और मैंहर-पल ख़ुदा की सादगी कहता रहाकोयल बड़ी चालाक निकली थी ‘अनुज’हर राग को ही रागिनी कहता रहा— anujlakhnavi