अब तेरी राहों से भटकने का मंज़र होगा
गर चल पाया तो भी तू न मेरा रहबर होगा
तेरी आँखों की ख़ामोशी में तौहीन ही थी
अपनी क़ीमत मैं ख़ुद जानूँ तो बेहतर होगा
तेरी बातों में गर्मी न रही है अब जानाँ
मैं ने सोचा था लफ़्ज़ों में तो जौहर होगा
मैं ने देखा है तेरे हँसने के पीछे भी शक
तेरे दिल में मेरी ख़ातिर कुछ महशर होगा
तुझ को आईने में जो दिखता है अक्स तेरा
शायद वो रस्म-ए-उल्फ़त का सौदागर होगा
— arjun chamoli















