दरख़्तों के साए भी झुलसा रहे हैं
यही इश्क़ है हम किए जा रहे हैं
कभी आ
समाँ पे भी बिजली गिरे अब
ज़मीं पे सितम क्यूँ सभी ढा रहे हैं
तलाश-ए-सुकूँ जो मोहब्बत में करते
कि चैन-ओ-अमन रोज़ दफ़ना रहे हैं
किसी हुस्न वाले ने आदत न छोड़ी
रक़ीबों को आपस में उलझा रहे हैं
कफ़न में से मुर्दा ये ख़ुश हो के बोला
जरा वक़्त बीते कि सब आ रहे हैं
फ़क़ीरी मिरी देख अंधे हुए या
बुरा वक़्त है लोग क़तरा रहे हैं
— arjun chamoli















