यूँँ न होंठों में दबा ली जाएगी
बात निकलेगी, निकाली जाएगी
आ गया है वस्ल को महबूब भी
अब कसर सारी निकाली जाएगी
ये ख़ुदा का हुक्म है सबके लिए
मौत आई तो, न टाली जाएगी
हम सँभालेंगे चमन का अब निज़ाम
रुख़ से फूलों के न लाली जाएगी
बाद मरने के मेरे, होगा यही
तीन मुट्ठी ख़ाक डाली जाएगी
आईने पर ज़ोर चलना है मुहाल
आँख बस हम पर निकाली जाएगी
हाँ, मगर हम बेवफ़ा होंगे नहीं
बात गर बिगड़ी बना ली जाएगी
अब के भी मसरूफ़ होंगे सब अज़ीज़
अब के भी ये ईद ख़ाली जाएगी
दोष लहरों को न देगा एक वो
हर कमी साहिल पे डाली जाएगी
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