मैं चुप हूँ और दुनिया सुन रही है
ख़मोशी दास्तानें बुन रही है
तअ'ज्जुब है कि इक सोने की चिड़िया
बयाबानों में तिनके चुन रही है
कहाँ नेकी गुनाहों से ही बच लें
हमें तो बस यही इक धुन रही है
तुझे महसूस करते भी तो कैसे
छठी हिस भी हमारी सुन रही है
मैं उस बस्ती का बाशिंदा था यारब
जहाँ सच्चाई भी अवगुन रही है
यहाँ गर्दिश में हैं दिन रात 'अंजुम'
वहाँ बस इक सदा-ए-कुन रही है
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