chan ke aati hai jo ye raushni darwaaze se | छन के आती है जो ये रौशनी दरवाज़े से

  - Ashraf Yousafi

छन के आती है जो ये रौशनी दरवाज़े से
क्या मुझे देख रहा है कोई दरवाज़े से

घर की तख़्ती से मिला आज मुझे अपना पता
अपने होने की गवाही मिली दरवाज़े से

मैं ने दहलीज़ से जाने की इजाज़त ले ली
फिर मिरी बात न तय हो सकी दरवाज़े से

एक रौज़न में पड़ी आँख से खुलने लगे हैं
एक दीवार के अंदर कई दरवाज़े से

मैं ने इस ख़्वाब को अंदर कहीं मिस्मार किया
मेरी आवाज़ न बाहर गई दरवाज़े से

रात भर सिसकियाँ लेता है कोई शख़्स यहाँ
कभी दीवार से लग कर कभी दरवाज़े से

ख़ाली कमरा मिरा किस चाप से भर जाता है
आता जाता ही नहीं जब कोई दरवाज़े से

एक ख़ुशबू ने क़दम भूल के बाहर रक्खा
फिर गली आँख मिलाने लगी दरवाज़े से

रोज़ इक शहर-ए-पुर-असरार में खो जाता हूँ
वही गलियाँ वही रस्ते वही दरवाज़े से

तू ने महताब निकलते हुए देखा है कभी
और महताब भी ऐसे किसी दरवाज़े से

  - Ashraf Yousafi

Good night Shayari

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