जो मौजूअ है शा'इरी में

कोई भी नहीं ज़िंदगी में

तुझे चूम कर मैं ने जाना
कमी तेरी थी तिश्नगी में

रगों से लिया इश्क़ का ख़ूँ
कोई भर रहा ख़ुद-कुशी में

मेरी आँख तक अब मेरी है
तेरा कुछ नहीं आशिक़ी में

तू भी देखें तुझ जैसा होना
तू आए कभी मुफ्लिसी में

मुझे याद आती नहीं तू
कमी रह गई दिल-लगी में

वो ख़ामोश रखता मुझे पर
बहुत रोता है ख़ामुशी में

तो सय्यद मैं ये मान लूँ अब
कि ग़म है रवा सर
ख़ुशी में

— Aves Sayyad

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