"हिज्र"

चलो तुम छोड़कर जाओ यहाँ से

ज़रा देखूँ कोई आया वहाँ से
यही है आख़िरी पैग़ाम उस का

किसी क़ीमत न मंज़िल से मैं भटकूँ
तमन्ना साथ का करते हैं रब से

मुझे रस्ता दिखाओ ना तुम मौला
महक उस इत्र का अब तक न भूला

लगा जो सामने आई थी मेरी
मुझे बोला कि सुन ले ऐ मुसाफ़िर

मिरा दिल साथ ले जाओगे क्या तुम
लबों से यूँ तो वो कुछ भी न बोली

दिलों का खेल मानो चल रहा था
दिलों के पास ही ख़ंजर छुपा था

हाँ पागल था न मुझ को क्या पता था
समय आया जहाँ रस्ता अलग था

मिरा कमरा था उस का तो महल था
मिटा के फ़ासले कैसे बनाता

बता 'रंजन' उसे दुल्हन बनाता

— ABHISHEK RANJAN

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