मेरे बस में नहीं इलाज उस का
ज़ख़्म देखा है मैं ने आज उस का
पस-ए-दरबार भी है इक दरबार
कासा बनता है रोज़ ताज उस का
कोई लश्कर भी ग़ालिब आ जाए
दोनों जानिब है इंदिराज उस का
जितना आगे का आदमी है वो
रद न कर दे उसे समाज उस का
चोर को रिज़्क़ की कमी कैसी
सारे खेतों में है अनाज उस का
गिले तकिए पे दर्ज है 'अज़हर'
बंध कमरे में एहतिजाज उस का
— Azhar Faragh















