निगाह-ए-दिल से बता जिस्म की ज़बाँ से नहीं
कहाँ कहाँ से तू हमारा है कहाँ से नहीं
मैं अपनी तेज़ी-ए-रफ़्तार का निशाना बना
ये तीर हाथ से मुझ को लगा कमाँ से नहीं
तो क्या बस इतना तुम्हें ए'तिबार है हम पर
फ़लाँ फ़लाँ से रखो राब्ता फ़लाँ से नहीं
हम अपने सेहन से निकले हुए शजर हैं 'फ़राग'
गली से याद किए जाएँगे मकाँ से नहीं
— Azhar Faragh















