गाँव
सहज, सरल और निर्मल होता है
आज भी गाँव में सब के मन से मन मिलते हैं
गुस्ताख़ियाँ, बेबाकियाँ यहाँ कहाँ होती हैं
यहाँ तो सब के सीने में दिलदारियाँ मिलती हैं
उमंगों भरी सुब्ह और अनुभव भरी शाम होती है
आज भी गाँव में पेड़ों की छाँव में सुकून भरी दोपहरी मिलती है
घर कच्चा हो लेकिन बातें सच्ची होती हैं
इतना प्यार है गाँव में कि दीवारों की दीवारों से बातें होती हैं
और नफ़रतों की बात ही छोड़ो अगर आ गई तो गले मिल कर शर्मिंदा होती है
— Shubham Upwan














