जफ़ा जो जी को जलाए तो उसको क्या कहिए
वफ़ा भी रास न आए तो उसको क्या कहिए
किसी के ख़्वाब सताएँ तो उनका क्या कीजे
किसी की याद रुलाए तो उसको क्या कहिए
जो मिल भी जाए तो ऐसे कि जानता ही नहीं
न कुछ सुने न सुनाए तो उसको क्या कहिए
शफ़ीक़ भी है ख़ुदा-तर्स भी मगर काफ़िर
सितम से बाज़ न आए तो उसको क्या कहिए
नसीम-ए-सुब्ह जो उसकी गली से गुज़री है
इधर से हो के न जाए तो उसको क्या कहिए
वो बिजलियों की लपक हो कि जुगनुओं की चमक
जिगर में आग लगाए तो उसको क्या कहिए
गुलों के सोग में बुलबुल की मर्सिया-ख़्वानी
दिलों को चीर सी जाए तो उसको क्या कहिए
कोई हसीन कली ओस में नहाती हुई
जो अंग अंग छुपाए तो उसको क्या कहिए
'बशर' ज़बान पे लुत्फ़-ए-विसाल की बातें
वो सुन के झेंप सा जाए तो उसको क्या कहिए
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