जाने कैसा दिल-ए-मायूस में डर बैठ गया
जो था लड़ने को बढ़ा थाम के सर बैठ गया
नातवाँ दिल है मिरा ख़ुद को सँभाले कब तक
बार-ए-ग़म जब भी बढ़ा ज़ेर-ए-असर बैठ गया
ले लिया मैंने भी यूँँ तेरे सितम का बदला
मेरे इन अश्कों से ज़ालिम तिरा घर बैठ गया
उसको दिल में ही बसाया है नफ़ासत से बहुत
किस क़रीने से अँगूठी में गुहर बैठ गया
ज़िद अना की थी मिरी या कि थी क़िस्मत ऐसी
उस तरफ़ बँट रहे मोती मैं इधर बैठ गया
कुछ न मिल पाया मुहब्बत में रियाकारों को
जिसकी बुनियाद थी कमज़ोर वो घर बैठ गया
यूँँ तो मैं अज़्म के घोड़े को हूँ दौड़ाने चला
पर ये डर भी है कि क्या होगा अगर बैठ गया
बे-अदब बज़्म में उसने था मदू मुझको किया
दिल तो बिलकुल भी न था मेरा मगर बैठ गया
सरफ़रोशी का जुनूँ था कि थी ये जाँबाज़ी
जा के मक़्तल में वो बे-ख़ौफ़-ओ-ख़तर बैठ गया
हमने ढलते हुए सूरज को जो देखा तो लगा
जैसे थक कर कोई दौरान-ए-सफ़र बैठ गया
अब करूँँ कैसे मैं मंज़िल के न मिलने का गिला
देख कर छाँव सर-ए-राह 'बशर' बैठ गया
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