शिरकत-ए-बज़्म से चाहे कोई इनकार न हो
कैसे आएँगे वो जब तक ज़रा इसरार न हो
ज़िन्दगी ऐसे मुसाफ़िर की थकन है जिस पर
इक घने पेड़ का साया भी असरदार न हो
बेबसी आज के इन्साँ की है कुछ यूँँ गोया
नाव तूफ़ाँ में हो और हाथ में पतवार न हो
कहिए इस शहर में अब कौन सा घर है ऐसा
जिस
में आँगन तो हो पर बीच में दीवार न हो
अक़्ल से वक़्त बदल सकता है दानिश-मंदों
क्या है शमशीर-ब-कफ़ बढ़ के अगर वार न हो
इन दिनों शहर में हैं ऐसी हवाएँ यारों
दिल ये करता है कि घर मेरा हवादार न हो
यूँँ है मशरूफ़ 'बशर' अब कि तरस आता है
अपने बच्चे ही न पहचाने जो इतवार न हो
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