क्या वो पहचान जाएगी मुझ को
या अभी और सताएगी मुझ को
ज़िंदगी बस मैं थक गया हूँ अब
और कितना चलाएगी मुझ को
मेरी हर बात काट के गई है
अब वो क्या मुँह दिखाएगी मुझ को
रात का खाना खा लिया है अब
घर की तकलीफ़ खाएगी मुझ को
बचपना ख़त्म हो गया है अब
अब मुहब्बत न भाएगी मुझ को
नौकरी पर मैं लग गया हूँ 'ब्रज'
ज़िंदगी अब नचाएगी मुझ को
इक ही उम्मीद पे तो ज़िंदा हूँ
मौत आ कर बचाएगी मुझ को
— Brajnabh Pandey















