उस रात से जाने हुआ क्या है मुझे
अब दर्द भी हँसना सिखाता है मुझे
जब भी ख़ुशी की ओर रखता हूँ क़दम
पीछे से कोई खींच लाता है मुझे
उस के सिवा कुछ भी न देखूँ और करूँ
ऐसी हिदायत कोई देता है मुझे
अपना बदन भी है रुकावट लगता जब
आग़ोश में अपनी वो भरता है मुझे
अपने बदन से ही जलन होती है अब
ऐसी मुहब्बत कोई करता है मुझे
वो हुक्म यारों मुझ को ऐसे देता है
जैसे कोई एहसान करता है मुझे
उस को ये फ़न मैं ने सिखाया मैं ने 'ब्रज'
वो सौ तरह से मार सकता है मुझे
— Brajnabh Pandey















