कभी रुस्वाई अपनी और ज़िल्लत याद आती है
तुम्हें जब देखते हैं तो मुहब्बत याद आती है
कभी जब बात कर के ख़ूब हम इतराने लगते थे
मुहब्बत की सनम वो सारी शिद्दत याद आती है
मुहब्बत के जो क़ातिल थे उन्हें अपना समझ बैठे
रक़ीबों से तुम्हारी थी वो मिल्लत याद आती है
ज़माना भी हमें जब देखता था साथ दोनों को
सनम हमको भी अपनी और संगत याद आती है
इरादा प्यार में शादी भी करनी थी सनम तुम सेे
ऐ 'दानिश' वो तुम्हारी पाक निय्यत याद आती है
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