कुछ आदमी समाज पे बोझल हैं आज भी

रस्सी तो जल गई है मगर बल हैं आज भी

इंसानियत को क़त्ल किया जाए इस लिए
दैर ओ हरम की आड़ में मक़्तल हैं आज भी

अब भी वही है रस्म-ओ-रिवायत की बंदगी
मतलब ये है कि ज़ेहन मुक़फ़्फ़ल हैं आज भी

बातें तुम्हारी शैख़ ओ बरहमन ख़ता मुआ'फ़
पहले की तरह ग़ैर-मुदल्लल हैं आज भी

'राही' हर एक सम्त फ़साद ओ इनाद के
छाए हुए फ़ज़ाओं में बादल हैं आज भी

— Divakar Rahi

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