0

इस शहर-ए-निगाराँ की कुछ बात निराली है  - Divakar Rahi

इस शहर-ए-निगाराँ की कुछ बात निराली है
हर हाथ में दौलत है हर आँख सवाली है

शायद ग़म-ए-दौराँ का मारा कोई आ जाए
इस वास्ते साग़र में थोड़ी सी बचा ली है

हम लोगों से ये दुनिया बदली न गई लेकिन
हम ने नई दुनिया की बुनियाद तो डाली है

उस आँख से तुम ख़ुद को किस तरह छुपाओगे
जो आँख पस-ए-पर्दा भी देखने वाली है

जब ग़ौर से देखी है तस्वीर तिरी मैं ने
महसूस हुआ जैसे अब बोलने वाली है

दुनिया जिसे कहती है बे-राह-रवी 'राही'
जीने के लिए हम ने वो राह निकाली है

Divakar Rahi
0

Share this on social media

Miscellaneous Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Divakar Rahi

As you were reading Shayari by Divakar Rahi

Similar Writers

our suggestion based on Divakar Rahi

Similar Moods

As you were reading Miscellaneous Shayari