बेहतर हमारा हाल था बेहतर बराए नाम
करते रहे इलाज वो अक्सर बराए नाम
सब लोग ज़िन्दगी में मुसाफ़िर बने रहे
घर रह गया है दोस्तों अब घर बराए नाम
मैं जानती हूँ मेरी कोई शख़्सियत नहीं
वो मुझको कह रहे हैं सिकंदर बराए नाम
शीशा-गरों से कोई अदावत नहीं हमें
हम हाथ में उठाए हैं पत्थर बराए नाम
मंज़िल को ख़ुद तलाश करें अहल-ए-कारवाँ
रहबर तो हो के रह गए रहबर बराए नाम
मस्ती सुरूर कैफ़ का एहसास क्या 'सबा'
महफ़िल में आज छलका है साग़र बराए नाम
As you were reading Shayari by divya 'sabaa'
our suggestion based on divya 'sabaa'
As you were reading undefined Shayari