दिल में मिरे हज़ार अलम ही जवाँ रहे
या रब मगर लबों पे हँसी का समाँ रहे
मंज़िल की जुस्तजू है न राहों का इश्तियाक़
ऐ दिल बला के साथ न अब कारवाँ रहे
आँखें भी आज़माई गई राह-ए-ज़ीस्त में
क़ल्ब-ओ-जिगर भी मुब्तिला-ए-इम्तिहाँ रहे
साहिल दिखा ख़ुदा या सफ़ीना डुबो ही दे
कब तक हवा से महव-ए-जदल बादबाँ रहे
अपनी ख़ुशी का एक भी लम्हा मिले तो क्यूँँ
जब इख़्तियार-ए-ग़ैर में उम्र-ए-रवाँ रहे
क्या 'इश्क़ है यही कि रहे वो सितम-ज़रीफ़
और मेरे लब पे नाला-ओ-आह-ओ-फ़ुग़ाँ रहे
इक लम्हा-ए-अना ने जुदा कर दिया उन्हें
दो जिस्म थे जो और सदा एक जाँ रहे
इक दिन मैं मुश्त-ए-ख़ाक तो हो जाऊँगी फ़ना
शायद 'सबा' मता-ए-सुख़न जाविदाँ रहे
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