साहिलों पर उदासी रही
इक नदी फिर से प्यासी रही
रात ने नींद पहनी मगर
ख़्वाब की बे-लिबासी रही
हुस्न वो खिलखिलाता रहा इश्क़ पर बद-हवा सेी सी रही
आज फिर कुछ न कह पिए हम
आज फिर बात बासी रही
कम न हो लम्स की आँच ये
बर्फ़ बस अब ज़रा सी रही
जिस्म मंदिर हुआ सो हुआ
रूह तो देव-दासी रही
मौत पर किस लिए रोएँ हम
ज़िंदगी अच्छी-ख़ासी रही
— Gautam Rajrishi















