parinda qaid men kul aasmaan bhool gaya | परिंदा क़ैद में कुल आसमान भूल गया

  - Hashim Raza Jalalpuri

परिंदा क़ैद में कुल आसमान भूल गया
रिहा तो हो गया लेकिन उड़ान भूल गया

मिरे शिकार को तरकश में तीर लाया मगर
वो मेरी जान का दुश्मन कमान भूल गया

उसे तो याद है सारा जहान मेरे सिवा
मैं उस याद में सारा जहान भूल गया

वो शख़्स ज़िंदगी भर का थका हुआ था मगर
जो पाँव क़ब्र में रक्खे थकान भूल गया

ग़रीब-ए-शहर ने रक्खी है आबरू वर्ना
अमीर-ए-शहर तो उर्दू ज़बान भूल गया

तमाम शहर का नक़्शा बनाने वाला 'रज़ा'
जुनून-ए-शौक़ में अपना मकान भूल गया

  - Hashim Raza Jalalpuri

Crime Shayari

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