vo tabassum tha jahaan shaayad wahin par rah gaya | वो तबस्सुम था जहाँ शायद वहीं पर रह गया

  - Imtiyaz Khan

वो तबस्सुम था जहाँ शायद वहीं पर रह गया
मेरी आँखों का हर इक मंज़र कहीं पर रह गया

मैं तो हो कर आ गया आज़ाद उस की क़ैद से
दिल मगर इस जल्द-बाज़ी में वहीं पर रह गया

कौन सज्दों में निहाँ है जो मुझे दिखता नहीं
किस के बोसे का निशाँ मेरी जबीं पर रह गया

हम को अक्सर ये ख़याल आता है उस को देख कर
ये सितारा कैसे ग़लती से ज़मीं पर रह गया

हम लबों को खोल ही कब पाए उस के सामने
इक नया इल्ज़ाम फिर देखो हमीं पर रह गया

  - Imtiyaz Khan

Khushi Shayari

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