वो देखता है मुझे दोस्त बे-नियाज़ी से
मैं देखता हूँ मगर उसको बे-क़रारी से
मिरे इलाज का ज़रिया तो उसकी आँखें हैं
मिरा इलाज नहीं होगा चारासाज़ी से
मलाल ये नहीं हम हो गए शिकस्ता-पा
मलाल ये है कि टूटे हैं बद-गुमानी से
As you were reading Shayari by Harsh Kumar Bhatnagar
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