ज़िंदगी जीने का या रब मुझे ढब आ जाए
मौत का क्या है न जाने कहाँ कब आ जाए
मैंने चेहरे को किया साफ़ है इन आँसुओं से
खींचने को मिरी तस्वीर वो अब आ जाए
जब वो आए तो उसे कहना कि माथा चू
में
क्या पता कब मिरे होंठों पे तलब आ जाए
ऐ ख़ुदा मुझ को भले आज तवज्जोह न मिले
देर से ही मुझे पर शेर-ओ-अदब आ जाए
As you were reading Shayari by Harsh Kumar Bhatnagar
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